The Daily Audio Bible
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सोपर को अय्यूब का उत्तर
12 फिर अय्यूब ने सोपर को उत्तर दिया:
2 “निःसन्देह तुम सोचते हो कि मात्र
तुम ही लोग बुद्धिमान हो,
तुम सोचते हो कि जब तुम मरोगे तो
विवेक मर जायेगा तुम्हारे साथ।
3 किन्तु तुम्हारे जितनी मेरी बुद्धि भी उत्तम है,
मैं तुम से कुछ घट कर नहीं हूँ।
ऐसी बातों को जैसी तुम कहते हो,
हर कोई जानता है।
4 “अब मेरे मित्र मेरी हँसी उड़ाते हैं,
वह कहते है: ‘हाँ, वह परमेश्वर से विनती किया करता था, और वह उसे उत्तर देता था।
इसलिए यह सब बुरी बातें उसके साथ घटित हो रही है।’
यद्यपि मैं दोषरहित और खरा हूँ, लेकिन वे मेरी हँसी उड़ाते हैं।
5 ऐसे लोग जिन पर विपदा नहीं पड़ी, विपदाग्रस्त लोगों की हँसी किया करते हैं।
ऐसे लोग गिरते हुये व्यक्ति को धक्का दिया करते हैं।
6 डाकुओं के डेरे निश्चिंत रहते हैं,
ऐसे लोग जो परमेश्वर को रुष्ट करते हैं, शांति से रहते हैं।
स्वयं अपने बल को वह अपना परमेश्वर मानते हैं।
7 “चाहे तू पशु से पूछ कर देख,
वे तुझे सिखादेंगे,
अथवा हवा के पक्षियों से पूछ
वे तुझे बता देंगे।
8 अथवा तू धरती से पूछ ले
वह तुझको सिखा देगी
या सागर की मछलियों को
अपना ज्ञान तुझे बताने दे।
9 हर कोई जानता है कि परमेश्वर ने इन सब वस्तुओं को रचा है।
10 हर जीवित पशु और हर एक प्राणी जो साँस लेता है,
परमेश्वर की शक्ति के अधीन है।
11 जैसे जीभ भोजन का स्वाद चखती है,
वैसी ही कानों को शब्दों को परखना भाता है।
12 हम कहते है, ‘ऐसे ही बूढ़ों के पास विवेक रहता है और लम्बी आयु समझ बूझ देती है।’
13 विवेक और सामर्थ्य परमेश्वर के साथ रहते है, सम्मत्ति और सूझ—बूझ उसी की ही होती है।
14 यदि परमेश्वर किसी वस्तु को ढा गिराये तो, फिर लोग उसे नहीं बना सकते।
यदि परमेश्वर किसी व्यक्ति को बन्दी बनाये, तो लोग उसे मुक्त नहीं कर सकते।
15 यदि परमेश्वर वर्षा को रोके तो धरती सूख जायेगी।
यदि परमेश्वर वर्षा को छूट दे दे, तो वह धरती पर बाढ़ ले आयेगी।
16 परमेश्वर समर्थ है और वह सदा विजयी होता है।
वह व्यक्ति जो छलता है और वह व्यक्ति जो छला जाता है दोनो परमेश्वर के हैं।
17 परमेश्वर मन्त्रियों को बुद्धि से वंचित कर देता है,
और वह प्रमुखों को ऐसा बना देता है कि वे मूर्ख जनों जैसा व्यवहार करने लगते हैं।
18 राजा बन्दियों पर जंजीर डालते हैं किन्तु उन्हें परमेश्वर खोल देता है।
फिर परमेश्वर उन राजाओं पर एक कमरबन्द बांध देता है।
19 परमेश्वर याजकों को बन्दी बना कर, पद से हटाता है और तुच्छ बना कर ले जाता है।
वह बलि और शक्तिशाली लोगों को शक्तिहीन कर देता है।
20 परमेश्वर विश्वासपात्र सलाह देनेवाले को चुप करा देता है।
वह वृद्ध लोगों का विवेक छीन लेता है।
21 परमेश्वर महत्वपूर्ण हाकिमों पर घृणा उंडेल देता है।
वह शासकों की शक्ति छीन लिया करता है।
22 परमेश्वर गहन अंधकार से रहस्यपूर्ण सत्य को प्रगट करता है।
ऐसे स्थानों में जहाँ मृत्यु सा अंधेरा है वह प्रकाश भेजता है।
23 परमेश्वर राष्ट्रों को विशाल और शक्तिशाली होने देता है,
और फिर उनको वह नष्ट कर डालता है।
वह राष्ट्रों को विकसित कर विशाल बनने देता है,
फिर उनके लोगों को वह तितर—बितर कर देता है।
24 परमेश्वर धरती के प्रमुखों को मूर्ख बना देता है, और उन्हें नासमझ बना देता है।
वह उनको मरुभूमि में जहाँ कोई राह नहीं भटकने को भेज देता है।
25 वे प्रमुख अंधकार के बीच टटोलते हैं, कोई भी प्रकाश उनके पास नहीं होता है।
परमेश्वर उनको ऐसे चलाता है, जैसे पी कर धुत्त हुये लोग चलते हैं।”
13 अय्यूब ने कहा:
“मेरी आँखों ने यह सब पहले देखा है
और पहले ही मैं सुन चुका हूँ जो कुछ तुम कहा करते हो।
इस सब की समझ बूझ मुझे है।
2 मैं भी उतना ही जानता हूँ जितना तू जानता है,
मैं तुझ से कम नहीं हूँ।
3 किन्तु मुझे इच्छा नहीं है कि मैं तुझ से तर्क करूँ,
मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर से बोलना चाहता हूँ।
अपने संकट के बारे में, मैं परमेश्वर से तर्क करना चाहता हूँ।
4 किन्तु तुम तीनो लोग अपने अज्ञान को मिथ्या विचारों से ढकना चाहते हो।
तुम वो बेकार के चिकित्सक हो जो किसी को अच्छा नहीं कर सकता।
5 मेरी यह कामना है कि तुम पूरी तरह चुप हो जाओ,
यह तुम्हारे लिये बुद्धिमत्ता की बात होगी जिसको तुम कर सकते हो!
6 “अब, मेरी युक्ति सुनो!
सुनो जब मैं अपनी सफाई दूँ।
7 क्या तुम परमेश्वर के हेतु झूठ बोलोगे?
क्या यह तुमको सचमुच विश्वास है कि ये तुम्हारे झूठ परमेश्वर तुमसे बुलवाना चाहता है
8 क्या तुम मेरे विरुद्ध परमेश्वर का पक्ष लोगे?
क्या तुम न्यायालय में परमेश्वर को बचाने जा रहे हो?
9 यदि परमेश्वर ने तुमको अति निकटता से जाँच लिया तो
क्या वह कुछ भी अच्छी बातपायेगा?
क्या तुम सोचते हो कि तुम परमेश्वर को छल पाओगे,
ठीक उसी तरह जैसे तुम लोगों को छलते हो?
10 यदि तुम न्यायालय में छिपे छिपे किसी का पक्ष लोगे
तो परमेश्वर निश्चय ही तुमको लताड़ेगा।
11 उसका भव्य तेज तुमको डरायेगा
और तुम भयभीत हो जाओगे।
12 तुम सोचते हो कि तुम चतुराई भरी और बुद्धिमत्तापूर्ण बातें करते हो, किन्तु तुम्हारे कथन राख जैसे व्यर्थ हैं।
तुम्हारी युक्तियाँ माटी सी दुर्बल हैं।
13 “चुप रहो और मुझको कह लेने दो।
फिर जो भी होना है मेरे साथ हो जाने दो।
14 मैं स्वयं को संकट में डाल रहा हूँ
और मैं स्वयं अपना जीवन अपने हाथों में ले रहा हूँ।
15 चाहे परमेश्वर मुझे मार दे।
मुझे कुछ आशा नहीं है, तो भी मैं अपना मुकदमा उसके सामने लड़ूँगा।
16 किन्तु सम्भव है कि परमेश्वर मुझे बचा ले, क्योंकि मैं उसके सामने निडर हूँ।
कोई भी बुरा व्यक्ति परमेश्वर से आमने सामने मिलने का साहस नहीं कर सकता।
17 उसे ध्यान से सुन जिसे मैं कहता हूँ,
उस पर कान दे जिसकी व्याख्या मैं करता हूँ।
18 अब मैं अपना बचाव करने को तैयार हूँ।
यह मुझे पता है कि
मुझको निर्दोष सिद्ध किया जायेगा।
19 कोई भी व्यक्ति यह प्रमाणित नहीं कर सकता कि मैं गलत हूँ।
यदि कोई व्यक्ति यह सिद्ध कर दे तो मैं चुप हो जाऊँगा और प्राण दे दूँगा।
20 “हे परमेश्वर, तू मुझे दो बाते दे दे,
फिर मैं तुझ से नहीं छिपूँगा।
21 मुझे दण्ड देना और डराना छोड़ दे,
अपने आतंको से मुझे छोड़ दे।
22 फिर तू मुझे पुकार और मैं तुझे उत्तर दूँगा,
अथवा मुझको बोलने दे और तू मुझको उत्तर दे।
23 कितने पाप मैंने किये हैं?
कौन सा अपराध मुझसे बन पड़ा?
मुझे मेरे पाप और अपराध दिखा।
24 हे परमेश्वर, तू मुझसे क्यों बचता है?
और मेरे साथ शत्रु जैसा व्यवहार क्यों करता है?
25 क्या तू मुझको डरायेगा?
मैं (अय्यूब) एक पत्ता हूँ जिसके पवन उड़ाती है।
एक सूखे तिनके पर तू प्रहार कर रहा है।
26 हे परमेश्वर, तू मेरे विरोध में कड़वी बात बोलता है।
तू मुझे ऐसे पापों के लिये दु:ख देता है जो मैंने लड़कपन में किये थे।
27 मेरे पैरों में तूने काठ डाल दिया है, तू मेरे हर कदम पर आँख गड़ाये रखता है।
मेरे कदमों की तूने सीमायें बाँध दी हैं।
28 मैं सड़ी वस्तु सा क्षीण होता जाता हूँ
कीड़ें से खाये हुये
कपड़े के टुकड़े जैसा।”
14 अय्यूब ने कहा,
“हम सभी मानव है
हमारा जीवन छोटा और दु:खमय है!
2 मनुष्य का जीवन एक फूल के समान है
जो शीघ्र उगता है और फिर समाप्त हो जाता है।
मनुष्य का जीवन है जैसे कोई छाया जो थोड़ी देर टिकती है और बनी नहीं रहती।
3 हे परमेश्वर, क्या तू मेरे जैसे मनुष्य पर ध्यान देगा?
क्या तू मेरा न्याय करने मुझे सामने लायेगा?
4 “किसी ऐसी वस्तु से जो स्वयं अस्वच्छ है स्वच्छ वस्तु कौन पा सकता है? कोई नहीं।
5 मनुष्य का जीवन सीमित है।
मनुष्य के महीनों की संख्या परमेश्वर ने निश्चित कर दी है।
तूने मनुष्य के लिये जो सीमा बांधी है, उसे कोई भी नहीं बदल सकता।
6 सो परमेश्वर, तू हम पर आँख रखना छोड़ दे। हम लोगों को अकेला छोड़ दे।
हमें अपने कठिन जीवन का मजा लेने दे, जब तक हमारा समय नहीं समाप्त हो जाता।
7 “किन्तु यदि वृक्ष को काट गिराया जाये तो भी आशा उसे रहती है कि
वह फिर से पनप सकता है,
क्योंकि उसमें नई नई शाखाऐं निकलती रहेंगी।
8 चाहे उसकी जड़े धरती में पुरानी क्यों न हो जायें
और उसका तना चाहे मिट्टी में गल जाये।
9 किन्तु जल की गंध मात्र से ही वह नई बढ़त देता है
और एक पौधे की तरह उससे शाखाऐं फूटती हैं।
10 किन्तु जब बलशाली मनुष्य मर जाता है
उसकी सारी शक्ति खत्म हो जाती है। जब मनुष्य मरता है वह चला जाता है।
11 जैसे सागर के तट से जल शीघ्र लौट कर खो जाता है
और जल नदी का उतरता है, और नदी सूख जाती है।
12 उसी तरह जब कोई व्यक्ति मर जाता है
वह नीचे लेट जाता है
और वह महानिद्रा से फिर खड़ा नहीं होता।
वैसे ही वह व्यक्ति जो प्राण त्यागता है
कभी खड़ा नहीं होता अथवा चिर निद्रा नहीं त्यागता
जब तक आकाश विलुप्त नहीं होंगे।
13 “काश! तू मुझे मेरी कब्र में मुझे छुपा लेता
जब तक तेरा क्रोध न बीत जाता।
फिर कोई समय मेरे लिये नियुक्त करके तू मुझे याद करता।
14 यदि कोई मनुष्य मर जाये तो क्या जीवन कभी पायेगा?
मैं तब तक बाट जोहूँगा, जब तक मेरा कर्तव्य पूरा नहीं हो जाता और जब तक मैं मुक्त न हो जाऊँ।
15 हे परमेश्वर, तू मुझे बुलायेगा
और मैं तुझे उत्तर दूँगा।
तूने मुझे रचा है,
सो तू मुझे चाहेगा।
16 फिर तू मेरे हर चरण का जिसे मैं उठाता हूँ, ध्यान रखेगा
और फिर तू मेरे उन पापों पर आँख रखेगा, जिसे मैंने किये हैं।
17 काश! मेरे पाप दूर हो जाएँ। किसी थैले में उन्हें बन्द कर दिया जाये
और फिर तू मेरे पापों को ढक दे।
18 “जैसे पर्वत गिरा करता है और नष्ट हो जाता है
और कोई चट्टान अपना स्थान छोड़ देती है।
19 जल पत्थरों के ऊपर से बहता है और उन को घिस डालता है
तथा धरती की मिट्टी को जल बहाकर ले जाती है।
हे परमेश्वर, उसी तरह व्यक्ति की आशा को तू बहा ले जाता है।
20 तू एक बार व्यक्ति को हराता है
और वह समाप्त हो जाता है।
तू मृत्यु के रूप सा उसका मुख बिगाड़ देता है,
और सदा सदा के लिये कहीं भेज देता है।
21 यदि उसके पुत्र कभी सम्मान पाते हैं तो उसे कभी उसका पता नहीं चल पाता।
यदि उसके पुत्र कभी अपमान भोगतें हैं, जो वह उसे कभी देख नहीं पाता है।
22 वह मनुष्य अपने शरीर में पीड़ा भोगता है
और वह केवल अपने लिये ऊँचे पुकारता है।”
15 इस पर तेमान नगर के निवासी एलीपज ने अय्यूब को उत्तर देते हुए कहा:
2 “अय्यूब, य़दि तू सचमुच बुद्धिमान होता तो रोते शब्दों से तू उत्तर न देता।
क्या तू सोचता है कि कोई विवेकी पुरुष पूर्व की लू की तरह उत्तर देता है?
3 क्या तू सोचता है कि कोई बुद्धिमान पुरुष व्यर्थ के शब्दों से
और उन भाषणों से तर्क करेगा जिनका कोई लाभ नहीं?
4 अय्यूब, यदि तू मनमानी करता है
तो कोई भी व्यक्ति परमेश्वर की न तो आदर करेगा, न ही उससे प्रार्थना करेगा।
5 तू जिन बातों को कहता है वह तेरा पाप साफ साफ दिखाती हैं।
अय्यूब, तू चतुराई भरे शब्दों का प्रयोग करके अपने पाप को छिपाने का प्रयत्न कर रहा है।
6 तू उचित नहीं यह प्रमाणित करने की मुझे आवश्यकता नहीं है।
क्योंकि तू स्वयं अपने मुख से जो बातें कहता है,
वह दिखाती हैं कि तू बुरा है और तेरे ओंठ स्वयं तेरे विरुद्ध बोलते हैं।
7 “अय्यूब, क्या तू सोचता है कि जन्म लेने वाला पहला व्यक्ति तू ही है?
और पहाड़ों की रचना से भी पहले तेरा जन्म हुआ।
8 क्या तूने परमेश्वर की रहस्यपूर्ण योजनाऐं सुनी थी
क्या तू सोचा करता है कि एक मात्र तू ही बुद्धिमान है?
9 अय्यूब, तू हम से अधिक कुछ नहीं जानता है।
वे सभी बातें हम समझते हैं, जिनकी तुझको समझ है।
10 वे लोग जिनके बाल सफेद हैं और वृद्ध पुरुष हैं वे हमसे सहमत रहते हैं।
हाँ, तेरे पिता से भी वृद्ध लोग हमारे पक्ष में हैं।
11 परमेश्वर तुझको सुख देने का प्रयत्न करता है,
किन्तु यह तेरे लिये पर्याप्त नहीं है।
परमेश्वर का सुसन्देश बड़ी नम्रता के साथ हमने तुझे सुनाया।
12 अय्यूब, क्यों तेरा हृदय तुझे खींच ले जाता है?
तू क्रोध में क्यों हम पर आँखें तरेरता है?
13 जब तू इन क्रोध भरे वचनों को कहता है,
तो तू परमेश्वर के विरुद्ध होता है।
14 “सचमुच कोई मनुष्य पवित्र नहीं हो सकता।
मनुष्य स्त्री से पैदा हुआ है, और धरती पर रहता है, अत: वह उचित नहीं हो सकता।
15 यहाँ तक कि परमेश्वर अपने दूतों तक का विश्वास नहीं करता है।
यहाँ तक कि स्वर्ग जहाँ स्वर्गदूत रहते हैं पवित्र नहीं है।
16 मनुष्य तो और अधिक पापी है।
वह मनुष्य मलिन और घिनौना है
वह बुराई को जल की तरह गटकता है।
17 “अय्यूब, मेरी बात तू सुन और मैं उसकी व्याख्या तुझसे करूँगा।
मैं तुझे बताऊँगा, जो मैं जानता हूँ।
18 मैं तुझको वे बातें बताऊँगा,
जिन्हें विवेकी पुरुषों ने मुझ को बताया है
और विवेकी पुरुषों को उनके पूर्वजों ने बताई थी।
उन विवेकी पुरुषों ने कुछ भी मुझसे नहीं छिपाया।
19 केवल उनके पूर्वजों को ही देश दिया गया था।
उनके देश में कोई परदेशी नहीं था।
20 दुष्ट जन जीवन भर पीड़ा झेलेगा और क्रूर जन
उन सभी वर्षों में जो उसके लिये निश्चित किये गये है, दु:ख उठाता रहेगा।
21 उसके कानों में भयंकर ध्वनियाँ होगी।
जब वह सोचेगा कि वह सुरक्षित है तभी उसके शत्रु उस पर हमला करेंगे।
22 दुष्ट जन बहुत अधिक निराश रहता है और उसके लिये कोई आशा नहीं है, कि वह अंधकार से बच निकल पाये।
कहीं एक ऐसी तलवार है जो उसको मार डालने की प्रतिज्ञा कर रही है।
23 वह इधर—उधर भटकता हुआ फिरता है किन्तु उसकी देह गिद्धों का भोजन बनेगी।
उसको यह पता है कि उसकी मृत्य़ु बहुत निकट है।
24 चिंता और यातनाऐं उसे डरपोक बनाती है और ये बातें उस पर ऐसे वार करती है,
जैसे कोई राजा उसके नष्ट कर डालने को तत्पर हो।
25 क्यो? क्योंकि दुष्ट जन परमेश्वर की आज्ञा मानने से इन्कार करता है, वह परमेश्वर को घूसा दिखाता है।
और सर्वशक्तिमान परमेश्वर को पराजित करने का प्रयास करता है।
26 वह दुष्ट जन बहुत हठी है।
वह परमेश्वर पर एक मोटी मजबूत ढाल से वार करना चाहता है।
27 दुष्ट जन के मुख पर चर्बी चढ़ी रहती है।
उसकी कमर माँस भर जाने से मोटी हो जाती है।
28 किन्तु वह उजड़े हुये नगरों में रहेगा।
वह ऐसे घरों में रहेगा जहाँ कोई नहीं रहता है।
जो घर कमजोर हैं और जो शीघ्र ही खण्डहर बन जायेंगे।
29 दुष्ट जन अधिक समय तक
धनी नहीं रहेगा
उसकी सम्पत्तियाँ नहीं बढ़ती रहेंगी।
30 दुष्ट जन अन्धेरे से नहीं बच पायेगा।
वह उस वृक्ष सा होगा जिसकी शाखाऐं आग से झुलस गई हैं।
परमेश्वर की फूँक दुष्टों को उड़ा देगी।
31 दुष्ट जन व्यर्थ वस्तुओं के भरोसे रह कर अपने को मूर्ख न बनाये
क्योंकि उसे कुछ नहीं प्राप्त होगा।
32 दुष्ट जन अपनी आयु के पूरा होने से पहले ही बूढ़ा हो जायेगा और सूख जायेगा।
वह एक सूखी हुई डाली सा हो जायेगा जो फिर कभी भी हरी नहीं होगी।
33 दुष्ट जन उस अंगूर की बेल सा होता है जिस के फल पकने से पहले ही झड़ जाते हैं।
ऐसा व्यक्ति जैतून के पेड़ सा होता है, जिसके फूल झड़ जाते हैं।
34 क्यों? क्योंकि परमेश्वर विहीन लोग खाली हाथ रहेंगे।
ऐसे लोग जिनको पैसों से प्यार है, घूस लेते हैं। उनके घर आग से नष्ट हो जायेंगे।
35 वे पीड़ा का कुचक्र रचते हैं और बुरे काम करते हैं।
वे लोगों को छलने के ढंगों की योजना बनाते हैं।”
29 नहीं तो जिन्होंने अपने प्राण दे दिये हैं, उनके कारण जिन्होंने बपतिस्मा लिया है, वे क्या करेंगे। यदि मरे हुए कभी पुनर्जीवित होते ही नहीं तो लोगों को उनके लिये बपतिस्मा दिया ही क्यों जाता है?
30 और हम भी हर घड़ी संकट क्यों झेलते रहते है? 31 भाइयो। तुम्हारे लिए मेरा वह गर्व जिसे मैं हमारे प्रभु यीशु मसीह में स्थित होने के नाते रखता हूँ, उसे साक्षी करके शपथ पूर्वक कहता हूँ कि मैं हर दिन मरता हूँ। 32 यदि मैं इफ्रिसुस में जंगली पशुओं के साथ मानवीय स्तर पर ही लड़ा था तो उससे मुझे क्या मिला। यदि मरे हुए जिलाये नहीं जाते, “तो आओ, खायें, पीएँ (मौज मनायें) क्योंकि कल तो मर ही जाना है।”(A)
33 भटकना बंद करो: “बुरी संगति से अच्छी आदतें नष्ट हो जाती हैं।” 34 होश में आओ, अच्छा जीवन अपनाओ, जैसा कि तुम्हें होना चाहिये। पाप करना बंद करो। क्योंकि तुममें से कुछ तो ऐसे हैं जो परमेश्वर के बारे में कुछ भी नहीं जानते। मैं यह इसलिए कह रहा हूँ कि तुम्हें लज्जा आए।
हमें कैसी देह मिलेगी?
35 किन्तु कोई पूछ सकता है, “मरे हुए कैसे जिलाये जाते हैं? और वे फिर कैसी देह धारण करके आते हैं?” 36 तुम कितने मूर्ख हो। तुम जो बोते हो वह जब तक पहले मर नहीं जाता, जीवित नहीं होता। 37 और जहाँ तक जो तुम बोते हो, उसका प्रश्न है, तो जो पौधा विकसित होता है, तुम उस भरेपुरे पौधे को तो धरती में नहीं बोते। बस केवल बीज बोते हो, चाहे वह गेहूँ का दाना हो और चाहे कुछ और। 38 फिर परमेश्वर जैसा चाहता है, वैसा रूप उसे देता है। हर बीज को वह उसका अपना शरीर प्रदान करता है। 39 सभी जीवित प्राणियों के शरीर एक जैसे नहीं होते। मनुष्यों का शरीर एक तरह का होता है जबकि पशुओं का शरीर दूसरी तरह का। चिड़ियाओं की देह अलग प्रकार की होती है और मछलियों की अलग। 40 कुछ देह दिव्य होती हैं और कुछ पार्थिव किन्तु दिव्य देह की आभा एक प्रकार की होती है और पार्थिव शरीरों की दूसरे प्रकार की। 41 सूरज का तेज एक प्रकार का होता है और चाँद का दूसरे प्रकार का। तारों में भी एक भिन्न प्रकार का प्रकाश रहता है। और हाँ, तारों का प्रकाश भी एक दूसरे से भिन्न रहता है।
42 सो जब मरे हुए जी उठेंगे तब भी ऐसा ही होगा। वह देह जिसे धरती में दफना कर “बोया” गया है, नाशमान है किन्तु वह देह जिसका पुनरुत्थान हुआ है, अविनाशी है। 43 वह काया जो धरती में “दफनाई” गयी है, अनादरपूर्ण है किन्तु वह काया जिसका पुनरुत्थान हुआ है, महिमा से मंडित है। वह काया जिसे धरती में “गाड़ा” गया है, दुर्बल है किन्तु वह काया जिसे पुनर्जीवित किया गया है, शक्तिशाली है। 44 जिस काया को धरती में “दफनाया” गया है, वह प्राकृतिक है किन्तु जिसे पुनर्जीवित किया गया है, वह आध्यात्मिक शरीर है।
यदि प्राकृतिक शरीर होते हैं तो आध्यात्मिक शरीरों का भी अस्तित्व है। 45 शास्त्र कहता है: “पहला मनुष्य (आदम) एक सजीव प्राणी बना।”(B) किन्तु अंतिम आदम (मसीह) जीवनदाता आत्मा बना। 46 आध्यात्मिक पहले नहीं आता, बल्कि पहले आता है भौतिक और फिर उसके बाद ही आता है आध्यात्मिक। 47 पहले मनुष्य को धरती की मिट्टी से बनाया गया और दूसरा मनुष्य (मसीह) स्वर्ग से आया। 48 जैसे उस मनुष्य की रचना मिट्टी से हुई, वैसे ही सभी लोग मिट्टी से ही बने। और उस दिव्य पुरुष के समान अन्य दिव्य पुरुष भी स्वर्गीय हैं। 49 सो जैसे हम उस मिट्टी से बने का रूप धारण करते हैं, वैसे ही उस स्वर्गिक का रूप भी हम धारण करेंगे।
50 हे भाइयो, मैं तुम्हें यह बता रहा हूँ: मांस और लहू (हमारे ये पार्थिव शरीर) परमेश्वर के राज्य के उत्तराधिकार नहीं पा सकते। और न ही जो विनाशमान है, वह अविनाशी का उत्तराधिकारी हो सकता है। 51 सुनो, मैं तुम्हें एक रहस्यपूर्ण सत्य बताता हूँ: हम सभी मरेंगे नहीं, बल्कि हम सब बदल दिये जायेंगे। 52 जब अंतिम तुरही बजेगी तब पलक झपकते एक क्षण में ही ऐसा हो जायेगा क्योंकि तुरही बजेगी और मरे हुए अमर हो कर जी उठेंगे और हम जो अभी जीवित हैं, बदल दिये जायेंगे। 53 क्योंकि इस नाशवान देह का अविनाशी चोले को धारण करना आवश्यक है और इस मरणशील काया का अमर चोला धारण कर लेना अनिवार्य है। 54 सो जब यह नाशमान देह अविनाशी चोले को धारण कर लेगी और वह मरणशील काया अमर चोले को ग्रहण कर लेगी तो शास्त्र का लिखा यह पूरा हो जायेगा:
“विजय ने मृत्यु को निगल लिया है।”(C)
55 “हे मृत्यु तेरी विजय कहाँ है?
ओ मृत्यु, तेरा दंश कहाँ है?”(D)
56 पाप मृत्यु का दंश है और पाप को शक्ति मिलती है व्यवस्था से। 57 किन्तु परमेश्वर का धन्यवाद है जो प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमें विजय दिलाता है।
58 सो मेरे प्यारे भाइयो, अटल बने डटे रहो। प्रभु के कार्य के प्रति अपने आपको सदा पूरी तरह समर्पित कर दो। क्योंकि तुम तो जानते ही हो कि प्रभु में किया गया तुम्हारा कार्य व्यर्थ नहीं है।
संगीत निर्देशक को यदूतून के लिये दाऊद का एक पद।
1 मैंने कहा, “जब तक ये दुष्ट मेरे सामने रहेंगे,
तब तक मैं अपने कथन के प्रति सचेत रहूँगा।
मैं अपनी वाणी को पाप से दूर रखूँगा।
और मैं अपने मुँह को बंद कर लूँगा।”
2 सो इसलिए मैंने कुछ नहीं कहा।
मैंने भला भी नहीं कहा!
किन्तु मैं बहुत परेशान हुआ।
3 मैं बहुत क्रोधित था।
इस विषय में मैं जितना सोचता चला गया, उतना ही मेरा क्रोध बढ़ता चला गया।
सो मैंने अपना मुख तनिक नहीं खोला।
4 हे यहोवा, मुझको बता कि मेरे साथ क्या कुछ घटित होने वाला है?
मुझे बता, मैं कब तक जीवित रहूँगा?
मुझको जानने दे सचमुच मेरा जीवन कितना छोटा है।
5 हे यहोवा, तूने मुझको बस एक क्षणिक जीवन दिया।
तेरे लिये मेरा जीवन कुछ भी नहीं है।
हर किसी का जीवन एक बादल सा है। कोई भी सदा नहीं जीता!
6 वह जीवन जिसको हम लोग जीते हैं, वह झूठी छाया भर होता है।
जीवन की सारी भाग दौड़ निरर्थक होती है। हम तो बस व्यर्थ ही चिन्ताएँ पालते हैं।
धन दौलत, वस्तुएँ हम जोड़ते रहते हैं, किन्तु नहीं जानते उन्हें कौन भोगेगा।
7 सो, मेरे यहोवा, मैं क्या आशा रखूँ?
तू ही बस मेरी आशा है!
8 हे यहोवा, जो कुकर्म मैंने किये हैं, उनसे तू ही मुझको बचाएगा।
तू मेरे संग किसी को भी किसी अविवेकी जन के संग जैसा व्यवहार नहीं करने देगा।
9 मैं अपना मुँह नहीं खोलूँगा।
मैं कुछ भी नहीं कहूँगा।
यहोवा तूने वैसे किया जैसे करना चाहिए था।
10 किन्तुपरमेश्वर, मुझको दण्ड देना छोड़ दे।
यदि तूने मुझको दण्ड देना नहीं छोड़ा, तो तू मेरा नाश करेगा!
11 हे यहोवा, तू लोगों को उनके कुकर्मो का दण्ड देता है। और इस प्रकार जीवन की खरी राह लोगों को सिखाता है।
हमारी काया जीर्ण शीर्ण हो जाती है। ऐसे उस कपड़े सी जिसे कीड़ा लगा हो।
हमारा जीवन एक छोटे बादल जैसे देखते देखते विलीन हो जाती है।
12 हे यहोवा, मेरी विनती सुन!
मेरे शब्दों को सुन जो मैं तुझसे पुकार कर कहता हूँ।
मेरे आँसुओं को देख।
मैं बस राहगीर हूँ, तुझको साथ लिये इस जीवन के मार्ग से गुजरता हूँ।
इस जीवन मार्ग पर मैं अपने पूर्वजों की तरह कुछ समय मात्र टिकता हूँ।
13 हे यहोवा, मुझको अकेला छोड़ दे,
मरने से पहले मुझे आनन्दित होने दे, थोड़े से समय बाद मैं जा चुका होऊँगा।
30 यदि यहोवा न चाहें तो, न ही कोई बुद्धि और न ही कोई अर्न्तदृष्टि, न ही कोई योजना पूरी हो सकती है।
31 युद्ध के दिन को घोड़ा तैयार किया है, किन्तु विजय तो बस यहोवा पर निर्भर है।
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